आंखों मे थे जो सजाये सपने
कुछ अपने, कुछ थे पराये सपने
न हो सके पूरे सब लेकिन
बहुत मैने आज़माये सपने
सोने न दें अक्सर ये मुझको
सारी रात मुझे जगाये सपने
कहां जाना था, कहां आ गया मैं
किस जगह, मुझे ले आये सपने
कैसे मिटा दूँ यादों को योगेश
दिल से नहीं जाते, भुलाये सपने
--योगेश गाँधी
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Saturday, November 7, 2009
Monday, September 21, 2009
दिल को जाने क्यूँ मैं बर्बाद किया करता हूँ
दिल को जाने क्यूँ मैं बर्बाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
की थी मैंने इश्क़ में पहल तो क्या
गिर गया मेरे सपनों का महल तो क्या
मज़बूत दिल की हर बुनियाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
हाल-ए-दिल बयां कर, क्या कुसूर किया मैने
दिल के अरमानों को चूर चूर किया मैने
तूने न की मोहब्बत पल भर के लिये लेकिन
पाने की तुझे अक्सर फरियाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
तु नहीं, तेरी कहानी अब भी है मेरे साथ
भीगी आंखों का पानी अब भी है मेरे साथ
नये नये गमों को इजाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
--योगेश गाँधी
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
की थी मैंने इश्क़ में पहल तो क्या
गिर गया मेरे सपनों का महल तो क्या
मज़बूत दिल की हर बुनियाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
हाल-ए-दिल बयां कर, क्या कुसूर किया मैने
दिल के अरमानों को चूर चूर किया मैने
तूने न की मोहब्बत पल भर के लिये लेकिन
पाने की तुझे अक्सर फरियाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
तु नहीं, तेरी कहानी अब भी है मेरे साथ
भीगी आंखों का पानी अब भी है मेरे साथ
नये नये गमों को इजाद किया करता हूँ
अकेला होता हूँ तो तुझे याद किया करता हूँ
--योगेश गाँधी
Sunday, September 13, 2009
दर्द नया है, ग़म वही फिर पुराना क्यूँ है
दर्द नया है, ग़म वही फिर पुराना क्यूँ है
आज भी ये शक्स उसका दीवाना क्यूँ है?
ग़र है मोहब्बत, तो आंखों में दिखेगी
लबों से कह कर प्यार जताना क्यूँ है?
इश्क़ है, न दौलत न शौहरत पास मेरे
ग़म-ए-इश्क़ का बचा सिर्फ़ खज़ाना क्यूँ है?
गर भड़क रही है, ये आग उधर भी इतनी
न मिलने का उसके पास बहाना क्यूँ है?
करता है इश्क़ हर कोई इस जहाँ में लेकिन
दिलवालों के खिलाफ फिर ये ज़माना क्यूँ है?
लोग खुद ही बन जाया करते हैं अपने योगेश
किसी को कह कर अपना बनाना क्यूँ है?
--योगेश गाँधी
आज भी ये शक्स उसका दीवाना क्यूँ है?
ग़र है मोहब्बत, तो आंखों में दिखेगी
लबों से कह कर प्यार जताना क्यूँ है?
इश्क़ है, न दौलत न शौहरत पास मेरे
ग़म-ए-इश्क़ का बचा सिर्फ़ खज़ाना क्यूँ है?
गर भड़क रही है, ये आग उधर भी इतनी
न मिलने का उसके पास बहाना क्यूँ है?
करता है इश्क़ हर कोई इस जहाँ में लेकिन
दिलवालों के खिलाफ फिर ये ज़माना क्यूँ है?
लोग खुद ही बन जाया करते हैं अपने योगेश
किसी को कह कर अपना बनाना क्यूँ है?
--योगेश गाँधी
Saturday, September 5, 2009
किसी को जहां से बस प्यार चाहिये
अपने दोस्त आदित्य की मदद से एक गज़ल तैयार की है, जो पेश कर रहा हूँ
किसी को जहां से बस प्यार चाहिये
किसी को बस चलता कारोबार चाहिये
अपनी ही ज़िन्दगी का कुछ इल्म नहीं है,
और औरों के घर जलाने को अंगार चाहिए.
ज़िन्दगी रहती नहीं हर वक्त एक सी
रहना हर मंज़र के लिये तैयार चाहिये
जमा कर ले चाहे जो ज़िन्दगी में मगर,
आखिरी सफ़र में बस कांधे चार चाहिए
भीड़ जुटाने की आदत नहीं है अपनी योगेश,
बस एक दोस्त चाहिए पर वफादार चाहिए
--योगेश गाँधी
किसी को जहां से बस प्यार चाहिये
किसी को बस चलता कारोबार चाहिये
अपनी ही ज़िन्दगी का कुछ इल्म नहीं है,
और औरों के घर जलाने को अंगार चाहिए.
ज़िन्दगी रहती नहीं हर वक्त एक सी
रहना हर मंज़र के लिये तैयार चाहिये
जमा कर ले चाहे जो ज़िन्दगी में मगर,
आखिरी सफ़र में बस कांधे चार चाहिए
भीड़ जुटाने की आदत नहीं है अपनी योगेश,
बस एक दोस्त चाहिए पर वफादार चाहिए
--योगेश गाँधी
Friday, September 4, 2009
Wednesday, September 2, 2009
Saturday, August 15, 2009
तेरे वादे पे हमको ऐतबार कितना था
तेरे वादे पे हमको ऐतबार कितना था
मत पूछ, हमें तुझसे प्यार कितना था
तुझे देखते ही बेकाबू हो गया जो पल में,
पता चला, दिल पे मेरा इख्तियार कितना था
कट तो गई ज़िन्दगी तेरे बगैर भी लेकिन
तुझे न दिखा ये शक्स बेकरार कितना था
दिल में ग़म था, खामोश रहा मैं फिर भी
यारों की ज़ुबां पर, ज़िक्र-ए-यार कितना था
एक अरसे से उसने याद भी नहीं किया
मेरे हर पल का कभी वो दावेदार कितना था
जाने किस बात पर धोखा दिया उसने योगी
हैरां हूँ, वो शक्स तो वफादार कितना था
--योगेश गाँधी
मत पूछ, हमें तुझसे प्यार कितना था
तुझे देखते ही बेकाबू हो गया जो पल में,
पता चला, दिल पे मेरा इख्तियार कितना था
कट तो गई ज़िन्दगी तेरे बगैर भी लेकिन
तुझे न दिखा ये शक्स बेकरार कितना था
दिल में ग़म था, खामोश रहा मैं फिर भी
यारों की ज़ुबां पर, ज़िक्र-ए-यार कितना था
एक अरसे से उसने याद भी नहीं किया
मेरे हर पल का कभी वो दावेदार कितना था
जाने किस बात पर धोखा दिया उसने योगी
हैरां हूँ, वो शक्स तो वफादार कितना था
--योगेश गाँधी
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